'जलसा' फिल्म रिव्यू

"मेरी बेटी की शादी होने वाली है, इस केस को जाने दो ना मैम", माथे पर शिकन और आंखों में आंसू लिए पुलिस अफसर सामने बैठी पत्रकार से कहता है।

'जलसा' के कहानी की सबसे खास बात है कि यहां सभी त्रुटिपूर्ण हैं, शायद इसीलिए हर किरदार से आप खुद को जोड़ पाएंगे।

यह न्याय और अन्याय नहीं, बल्कि नैतिक और अनैतिकता के द्वंद की कहानी है।

सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी ये फिल्म एक लड़की के हिट एंड रन केस से शुरु होती है, लेकिन धीरे धीरे एक साथ कई लोगों की जिंदगी को एक दूसरे से बांधती चली जाती है।

फिल्म की कहानी प्यार, लालच, रहस्य, नैतिकता, पश्चाताप के बीच झूलती है। वहीं, बीच बीच में निर्देशक की सोशल कमेंट्री भी चलती है।

माया मेनन (विद्या बालन) एक सेलिब्रेटेड पत्रकार हैं, जो अपनी ईमानदारी के लिए सुर्खियां बटोरती हैं। वह ऐसी शख्सियत हैं जो बड़े से बड़े अधिकारी से भी सवाल करने से नहीं हिचकिचाती हैं।

फिल्म की कहानी माया और उनकी हाउसहेल्प रुखसाना (शेफाली शाह) के इर्द गिर्द घूमती है। सबकी ज़िंदगी सही सपाट चल रही होती है।

एक रात रूखसाना की 18 वर्षीय बेटी आलिया एक हिट एंड रन घटना का शिकार बन जाती हैं। वह मौत के मुंह तक पहुंच जाती है।

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